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Monday, 23 July 2012

ना सही प्यार, मेरी इबादत तो कबूल कर ले...



एक दरिया जो मेरी आँख से बहता है अभी
उसके साहिल पे तेरे नाम की इमारत है कोई
मेरी आँखों के नमकीन पानी की वजह
खंडहर सी दिखती हुई वो मिस्मार सी है
तेरे इश्क में ये बात मैंने कुफ्र की कर दी
तेरी याद में वहां इबादत तेरे बुत की कर दी
न धुप, न कपूर, न लोबान की खुशबू
तेरी यादें , मेरी आंहें, और अश्को की माला
ऐ दोस्त मेरे वजूद ने तुझे इश्क की देवी माना
ना सही प्यार, मेरी इबादत तो कबूल  कर ले...

11 comments:

  1. उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवार के चर्चा मंच पर ।।

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    1. जी सर जी..धन्यवाद..

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  2. वाह..
    न सही प्यार मेरी इबादत तो कबूल कल ले....
    बहुत बेहतरीन पंक्तिया
    सुन्दर रचना...
    :-)

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    1. जी रीना जी शुक्रिया..

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  3. वाह ... बेहतरीन भाव

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    1. जी धन्यवाद 'सदा जी' आपक नाम शायद सीमा है...

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  4. सच्चा प्यार होगा तो एक दिन इबादत भी कबूल होगी प्यार भी कबूल होगा बहरहाल प्यारी रचना के लिए हार्दिक बधाई

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    1. जी जरुर..आप का बहुत धन्यवाद्

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  5. इबादत एक ज़रिया है, हृदय की बात कहने का।
    खुदा को मानना ही तो, हमारा फर्ज बनता है!!

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    1. आप का बहुत धन्यवाद् ...

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  6. बहुत सुंदर है !

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