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Friday, 12 October 2012

तेरे होंठ की सुर्खी...




तेरे होंठ की सुर्खी ले-ले कर
हर फूल ने आज किया सिंगार
तेरे ज़ुल्फ़ की खुशबु मौसम में
तेरे दम सेकालियों पे है निखार

जिस महफ़िल में तुम आ जाव
वहां एक सुरूर आ जाता है
मेरे शानो पे जब सर रखती हो
मुझे खुद पे गुरुर आ जाता है

कविता संग्रह 'हो न हो' से..

7 comments:

  1. वाह...
    बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (14-10-2012) के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    सूचनार्थ!

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  2. कविता में निम्न शब्द शुद्ध करें -

    खुशबु (खुश्बू .....),सेकालियों पे (से कलियों पे ......),जाव (जाओ ......),शानो (शानों .......),ब्रेकिट में शुद्ध रूप हैं .

    कविता में परम का उद्दात रूप व्यक्त हुआ है ,प्रेम पाकर प्रेयसी का प्रेमी गौरवान्वित है .

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  3. बहुत सुंदर |

    इस समूहिक ब्लॉग में आए और हमसे जुड़ें :- काव्य का संसार

    यहाँ भी आयें:- ओ कलम !!

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  4. सुन्दर भाव, आभार

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  5. सुन्दर रचना..
    :-)

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  6. बहुत सुन्दर भाव,,
    अनु

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  7. जी आप सबका बहुत आभार...

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