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Friday, 23 May 2014

बंज़र छातियाँ - सुधीर मौर्य

कमर पे रखे हुए 
घड़े से छलकते हुए पानी से 
खाली हुए घड़े को 
वापस भर देता है 
उसकी आँख से बहता हुआ पानी 
लोग करते हैं अश्लील इशारे 
पानी से भीग कर  
अधफटे वस्त्र 
चिपक जाते हैं नितम्बो से  
आँख झुका कर निकल जाती है वह 
फ़िक़रे कसती हुई गलियों से
आँगन में सास की गोद में रोते बच्चे को 
उठा लेती है  तड़प कर 
सीने से भींच कर उसका मुह 
लगा  लेती है अपने स्तनों से 
बच्चा बदस्तूर रोता है 
उसकी सुखी छातियाँ 
मना कर देती हैं दूध की बून्द टपकाने से 
भाग पड़ती है वह 
बच्चे  के लिए 
पाव दो पाव दूध लेने 
वह पिलाती है अपने बच्चे को दूध 
जो लाई है वह 
अपने स्तनों का दूध 
किसी चौधरी को पिलाके। 

लोग कसते हैं  
उसपे अश्लील फ़िक़रे 
पूछते है हॅंस हॅंस के 
उसकी देह का किराया 
और वह बच्चे के दूध के लिए 
निचुड़वाती है 
अपनी छातियों का दूध 
जो बंज़र पड़ी हैं 
न जाने कितने सालो से 
आदिवासी धरती की तरह। 

---सुधीर मौर्य

Friday, 20 December 2013

यहाँ मरकज़ में अब रोटी नमक है - सुधीर मौर्य

मिटाना चाहता मुझ को ज़माना 
समझ कर हमको एक मुफलिस दीवाना 

यहाँ मरकज़ में अब रोटी नमक  है 
वहां सोने के बिस्कुट का खजाना     

हुनर आता है तुमको ये अज़ल से 
दबे कुचले गरीबों को साताना     

 करोडो खा के लाखो पर नज़र है    
तिजोरी है कि सुरसा का मुहाना    

उलझो हम हैं उल्फत के सिपाही  
हमारी बाहँ में अब है ज़माना        
 (Abhinav pryas ke oct - dec 2013 ke ank me prkashit meri gazal)
--सुधीर मौर्य 

                      गंज जलालाबाद, उन्नाव, 209869                

Friday, 23 August 2013

सूखे पेड़ हरे पत्ते - सुधीर मौर्य

जनवरी की 
सर्द सडकों के 
दोनों ओर 
हल्की हवा से 
सरसराते 
सूखे पेड़-हरे पत्ते 
मेरी बेबसी पर 
कभी रोते 
कभी हँसते 


बड़ा गहरा 
ताल्लुक है मेरा 
इस सड़क 
और इनके किनारे के 
इन पडों से 
जिन्होंने मुझे 
निहारा था कभी 
मेरे गाँव की 
दोखेज दोशीजा के 
क़दमों से कदम 
मिलाते 
कभी पैदल 
कभी सायकल पर 
प्रीत के 
गीत गुनगुनाते 
कभी हाथों में हाथ डाले 
कभी एक दुसरे को सम्भाले 
ना जाने कितनी बार 
हमने मुकम्मल किया 
ये रास्ता 
बस हम दोनों 
ये सड़क 
और इसकी ओर के पेड़ 
और किसी से 
था वास्ता 
आज भी वही सड़क
आज भी वही हवा 
पर अब वो नहीं 
मेरे क़दमों से कदम 
मिलाने के लिए 
और रंग बदल गया
इन पेड़ों का मेरी तरह 
सूखे पेड़ हरे पत्ते 
मेरी बेबसी पर
कभी रोते 
कभी हँसते