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Saturday, 26 January 2013

गुल और मय्यत



Sudheer Maurya
*********************

मेरी मय्यत से 
लिपट कर 
वो गुलो का हार 
रो पडा 
शायद 
वो भी 
उसका 
ठुकराया हुआ था 

सुधीर मौर्य 'सुधीर'
 गंज जलालाबाद, उन्नाव 
209869 


   
 

Monday, 14 January 2013

फ्रेंडशिप बेंड ..



Sudheer Maurya 'Sudheer' 
********************************

लांघ कर 
अपनी अटारी की 
मुंडेर 
मेरी अटारी पे 
आके  
उसने बांधा था 
मेरी कलाई पे 
लजाते - सकुचाते 
फ्रेंडशिप बेंड 
जिसका रंग था 
राजहंस के पंखो जेसा।

बेंड तो बेंड था 
वक़्त के साथ 
टूट कर बिखर गया।
 लेकिन उसका उजलापन 
अब भी मेरी रातों में 
चांदनी बिखेरता है 
मेरी कलाई पर 
तेरी अँगुलियों का लम्स 
अब भी महकता है।

में जब भी देखता हूँ 
अपनी कलाई 
मेरे 
बिछड़े दोस्त मुझे तेरी 
दोस्ती 
याद आती है। 


सुधीर मौर्य 'सुधीर'
ग्राम और पोस्ट - गंज जलालाबाद 
जनपद - उन्नाव ( उत्तर प्रदेश )
 पिन – 209869

Thursday, 3 January 2013

Tuesday, 25 December 2012

पर समाज की रीत..



Sudheer Maurya 'Sudheer'
*********************************

बरसो बाद 
पतझड़ो के मौसम में
उनका दीदार हुआ..
हाथ में चूडियाँ
पावं में महावर
आँखों में काजल
और
माथे पे सिंदूर..

मुझे देख कर
उनके होठों पे
तैर गई, वही मुस्कान
जो बचपन से 
उनकी सूरत की सहेली रही...
और सच  पुछो तो 
यही मेरे जीवन की 
सबसे बड़ी पहली रही..
हाँ, हम जान ही न पाए
मुझसे प्रीत 
निभाते-निभाते
वो कब गैर हो गये

मुझे खामोश देख
उन्होंने हंस के
मेरा हाल पूछा 
में धीरे से बोल
बस जी रहा हूँ
कुछ ख़ास नहीं
तभी मेरे दिमाग में
विचार कोंधा
उनके चेहरे पे भी
पहले सा उजास नहीं

तभी एक 
चार साल की बच्ची
उन्हें मम्मी कह के
ऊँगली पकड़ के ले चली
बगल से गुजरते 
उनके आँचल के लम्स
ने मुझे 
ये एहसास कराया
अब उनमे  भी 
वो महक ,
वो लहक,
वो चहक - नहीं

शायद उन्हें 
बेवफाई उनकी
चैन से रहने नहीं देती
पर समाज की रीत 
अब भी उनके होठो से
कुछ कहने नहीं देती...

सुधीर मौर्य 'सुधीर'
गंजा जलालाबाद, उन्नाव
209869

Sunday, 23 December 2012

ओ ! हिन्द की बेटी दामिनी ..


सुधीर मौर्य 'सुधीर'
********************

सलाम करता हूँ 
में तेरी हिम्मत को
! हिन्द की बेटी
'दामिनी'
तुझे लड़ना है
मौत से 
और देना है उसे 
शिकस्त
उठ 
और बिजली की तरह 
चमक कर
सार्थक कर दे 
अपना नाम 
और लिख दे 
उन दरिंदो के
खून से
आसमान के
केनवास पर 
तूँ अबला नहीं  
जो दम तोड़ दे
घबरा के जहाँ के
 सितम से
तूँ तो वो सबला है
जो मिटा देती है
जुर्म करने वालो 
का नामोनिशान... 

  
(ये कविता नहीं दुआ है )  

Sudheer Maurya 'Sudheer'
sudheermaurya1979@rediffmail.com

Monday, 12 November 2012

कुछ मेरी भी खता होगी...



हर फैसला मेरे बाबत उसी का था
वो शक्स जो मुझे अब पहचानता नहीं

उसकी यादो के सहारे ही जी लेते
जो वो ख्वाबो में आकर सताता नहीं

नहीं-नहीं ये खबर मेरे दुश्मनों की होगी
उसके बालो में अब गजरा महेकता नहीं

कुछ मेरी भी खता होगी जो वो यूँ खफा हुआ
मेरे शहर में आये और मेरी गली से गुजरता नहीं

मेरी महक का निशां तेरी  सांसो में तो होगा
क्या तेरी जबीं पर मेरा लम्स दमकता नहीं

'लम्स' से..
सुधीर मौर्य 'सुधीर'