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Saturday, 12 May 2012

उसर में कास फूल रही थी (१)


















सपना था
उस की आँखों में
पढने का, लिकने का
आसमान में उड़ने का

चाँद सितारे पाने का
धनक धनक हो जाने का

वो थी सुन्दर
वो थी दलित
उसका यही अभिशाप था
वो थी मेधावी 
बचपन से
पर उसका गरीब बाप था.

आते ही किशोर अवस्था के
उसे गिद्ध निगाहें 
ताकने लगी
गाहे बगाहे दबंगों  की 
छिटाकशी वो सुनने लगी

एक रोज़ गावं के उसर में
कुछ हाथो ने
उसको खीच लिया
कपडे करके सब तार तार
जबरन सीने में भीच लिया

वो बेबस चिड़िया 
फरफराती  हुई
दबंगों के हाथो में झूल रही थी
उस घडी गावं के
उसर में,
 कास फूल रही थी 

सुधीर मौर्या 'सुधीर'
गंज जलालाबाद, उन्नाव
पिन- २४१५०२
०९६९९७८७६३४/09619483963

Friday, 11 May 2012

तेरा शहर तेरा गाँव














ये तेरा शहर

ये तेरा गाँव
मुबारक हो तुझे

मेरा क्या हे
में तो बस मेहमान हूँ
दो पल के लिए
महकता ही रहे
चहकता ही रहे
ये तेरा घर
ये आँगन तेरा
क्या हुआ
जोन न  रहा कोई फूल
मेरी ग़ज़ल के लिए

तूं सवरती ही रहे
तूं निखरती ही रहे
अपने साजन के लिए
भूल जा दिल से मुझे

तूं अपने कल के लिए

'सुधीर' के दामन में
ड़ाल दो
सब कांटे अपने
हर फूल हर सितारा
रख ले तूं
अपने आचल के लिए.   

'लम्स' से
सुधीर मौर्या 'सुधीर'
गंज जलालाबाद, उन्नाव
209869
09699787634

Wednesday, 9 May 2012

दिनचर्या


दिन गुज़रा जब रो रो के
और आँखों से बरसात हुई 
दिल और भी तब बेचैन हुआ 
जब साँझ ढली और रात हुई

घडी की हर एक टिक टिक का 
सम्बन्ध बना मेरी करवट से
तेरी याद में कितना तडपा हूँ
पूछो चादर की सलवट से

छिपते ही आखिरी तारे के
मेरी आँख की नदिया फूट पड़ी 
सूरज की पहली किरन के संग
तेरी यादें मुझ पर टूट पड़ी 

दिन गुज़रा जब रो रो के
और आँखों से बरसात हुई

सुधीर मौर्या 'सुधीर'
गंज जलालाबाद, उन्नाव
२०९८६९
०९६९९७८७६३४

Tuesday, 8 May 2012

आँख की नदिया सूख गई हे

सुन्दर गोरी और
जवान
ऊपर से ऊँची
जात की वो.                                    
अपने घर के
नोकर से ही
बाज़ी हार गई
जज्बात की वो.

कुछ आँखों ने था
देख लिया
छुप-छुप कर
मिलते बागो में
वो तीन दिनों से
गायब हे
जो रहता था
उसकी आँखों में.

कल शाम नहर के बांध में
उसकी ही
लाश पाई गई
वो रो न सकी
कुछ कह न सकी
उसकी आँखों की नदिया
हो न हो
शायद सूख गई.


सुधीर मौर्या 'सुधीर'
गंज जलालाबाद, उन्नाव
पिन- २४१५०२
09699787634

Saturday, 11 February 2012

प्रेम की नाव

उसकी बातो में
लगने लगा हे
बहुत कुछ
बनाव इन दिनों.


किसी और की
गली से
गुजरने लगे हे
उसके पावं इन दिनों.


मागने लगा हे
कोई और
उसके जुल्फों की
छाव इन दिनों.


हाँ चर्चे हे
उसके एक और
अफएर   के
गाँव में
इन दिनों.


हो न हो
वो सवार हे
प्रेम की
दो नाव में इन दिनों.


सुधीर मौर्या 'सुधीर'
गंज जलालाबाद, उन्नाव
२४१५०२
०९६९९७८७६३४/09619483963

Saturday, 4 February 2012

Aankh ki nadiya sukh gai he



सुन्दर गोरी और
जवान
ऊपर से ऊँची
जात की वो.
अपने घर के
नोकर से ही
बाज़ी हार गई
जज्बात की वो.



कुछ आँखों ने था
देख लिया
छुप-छुप कर
मिलते बागो में
वो तीन दिनों से
गायब हे
जो रहता था
उसकी आँखों में.



कल शाम नहर के बांध में
उसकी ही
लाश पाई गई
वो रो न सकी
कुछ कह न सकी
उसकी आँखों की नदिया
हो न हो
शायद सूख गई.





सुधीर मौर्या 'सुधीर'
गंज जलालाबाद, उन्नाव
पिन- 209869
09699787634 

Wednesday, 1 February 2012

वो अधरों के स्वर



नीले अम्बर के
मंडप तले
वो नीले नेनो का
जादू मुझे बेकल कर गया



कली गुलाबो के से
वो अधरों के स्वर
मेरे लफ्जों को
देखो ग़ज़ल कर गया



काली घटाओ के से
उन जुल्फों का उड़ना
उनके कदमो का लम्स
मेरी झोपडी को महल कर गया



अपने गमो को
आखिर भुला ही बेठे
मेरी आँखों को हाय
फ़साना दर्द का उनका सजल कर गया





'लम्स' से
सुधीर मौर्या 'सुधीर'
०९६९९७८७६३४