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Monday, 28 May 2012

तितली और तेरी याद




बाग़ में
न जाने कब तक
में देखता रहा-वो खेल
एक तितली का

कभी ये फूल-कभी वो फूल
कभी ये डाल-कभी वो डाल
कभी ये बूटा-कभी वो बूटा


जैसे चाहती हो
हर लुत्फ़ लेना
सिर्फ अपने लिए

खेल देख कर, थक गया
तो उठ कर चल दिया

देख कर - तितली
मुझे- न जाने क्यों
तेरी याद आ गई

सुधीर मौर्या 'सुधीर'
गंज जलालाबाद, उन्नाव-२०९८६९ 
 

Friday, 25 May 2012

मोतीझील



मोतीझील

वैसा ही तो हे सब कुछ

वही झील,
वही नाव,
वही सड़क
वही पेड़ खजूर के

वही जोड़े
हँसते-इठलाते



रेस्टोरेंट, देखकर
मे अन्दर गया
आर्डर किया
एक मसाला डोसा
तभी एहसास हुआ
कुछ तो बदल गया हे
क्योंकि
'मुझे चाउमीन'
यह आवाज मुझे सुनाई न दी.

'लम्स' से
सुधीर मौर्या 'सुधीर'
गंज जलालाबाद, उन्नाव
२०९८६९
०९६९९७८७६३४

Wednesday, 23 May 2012

तेरा अक्स






















तनहइयो ने कब
मेरे हाथ में
जाम दे दिया
कुछ इसका पता नहीं
हर शाम-हर रात
हर सुबह 
बस में और
मेरा जाम
मुझे लगा
अब जिन्दगी
चैन से कट जायगी
ग़लतफ़हमी थी मेरी
अब तो हाथ में
जाम लेने से भी
डर लगता हे
न जाने क्यों
तेरा अक्स
मुझे अब
उसमे नज़र आता हे.


'लम्स' से
सुधीर मौर्या 'सुधीर'
गंज जलालाबाद, उन्नाव
२०९८६९
09699787634 

प्रीत का रंग



इन दिनों
पलाश सा खिला है
चेहरा उसका

कोयल सी 
कुहक है
होंठो पे उसके

झील सी
आँखे करती है
अठखेलियाँ उसकी

खिलने लगी है
चंद्रिमा पूनम की
गालों मे उसके

हिरन सी
लचक है
चाल में उसकी

लगता है जेसे 
अवतरित हुआ है मधुमास
शरीर मे उसके

हो न हो
चड़ने  लगा है उसपे
प्रीत का रंग किसी-
का इन दिनों



Friday, 18 May 2012

चांदनी चाँद की आहट देती हे





















जिन्दगी जब से आई उनके घेरो में
रौशनी दिखने लगी हमको अन्धेरो मे


उनकी शरारते बड़ी भली लगने लगी
कंकड़ मर के छिपने उनका मुंडेरो में


ढलती शाम अब सुहानी लगने लगी
लुत्फ़ आने लगा हमको अब सवेरो मे


चांदनी चाँद की आहट दर पर देती हे
चमक दोस्तों हे आज हमारे डेरो में


सुधीर मौर्या    
गंज जलालाबाद, उन्नाव
209869

09699787634 

कुछ हुस्न-ऐ-जाना




















दोशीजा होठो पे शबनम के कतरे
लचके बदन पे कसाव जो निखरे
सावन को खुमारे जिस्म की याद
कंधो  पे खुलकर ज़ुल्फ़ हरसू बिखरे.


ज़ुल्फ़ खुल गए रात की अंधियारी हे
दुनिया पे उनका खुमार तारी  हे
सितारों का सुकूत दस्तक देता हे
कोई तूफ़ान आने की तय्यारी हे.


सुधीर मौर्या 'सुधीर'
गंज जलालाबाद, उन्नाव
209869
०९६९९७८७६३४
  

Tuesday, 15 May 2012

असीरी

















शफक की धुप में
मे जाकर छत पर तनहा खड़ा हो गया
पड़ोस की छत पे
बल बनाती हुई लड़की
मुस्करा दी
मैंने उसकी जानिब
जब कोई तवज्जो न दी
तो वो उतर कर
निचे चली गई
काश कुछ साल पहले
में एसा कर पाता
किसी की जुल्फों की
असीरी से खुद को बचा पाता
शायद तब
ये शफक ये शब्
मेरे तनहा न होते
या फिर वही बेवफा न होते
में- छत से उतर कर
एकांत कमरे में
तनहा बेथ गया


'लम्स' से
सुधीर मौर्या 'सुधीर'
गंज जलालाबाद,उन्नाव-२४१५०२
०९६९९७८७६३४

Book by Sudheer Maurya 'sudheer'

Collection of Gazal


Collection of Gazl & Nazm

















Collection of Stories
Collection of Nazm...

Saturday, 12 May 2012

उसर में कास फूल रही थी (१)


















सपना था
उस की आँखों में
पढने का, लिकने का
आसमान में उड़ने का

चाँद सितारे पाने का
धनक धनक हो जाने का

वो थी सुन्दर
वो थी दलित
उसका यही अभिशाप था
वो थी मेधावी 
बचपन से
पर उसका गरीब बाप था.

आते ही किशोर अवस्था के
उसे गिद्ध निगाहें 
ताकने लगी
गाहे बगाहे दबंगों  की 
छिटाकशी वो सुनने लगी

एक रोज़ गावं के उसर में
कुछ हाथो ने
उसको खीच लिया
कपडे करके सब तार तार
जबरन सीने में भीच लिया

वो बेबस चिड़िया 
फरफराती  हुई
दबंगों के हाथो में झूल रही थी
उस घडी गावं के
उसर में,
 कास फूल रही थी 

सुधीर मौर्या 'सुधीर'
गंज जलालाबाद, उन्नाव
पिन- २४१५०२
०९६९९७८७६३४/09619483963

Friday, 11 May 2012

तेरा शहर तेरा गाँव














ये तेरा शहर

ये तेरा गाँव
मुबारक हो तुझे

मेरा क्या हे
में तो बस मेहमान हूँ
दो पल के लिए
महकता ही रहे
चहकता ही रहे
ये तेरा घर
ये आँगन तेरा
क्या हुआ
जोन न  रहा कोई फूल
मेरी ग़ज़ल के लिए

तूं सवरती ही रहे
तूं निखरती ही रहे
अपने साजन के लिए
भूल जा दिल से मुझे

तूं अपने कल के लिए

'सुधीर' के दामन में
ड़ाल दो
सब कांटे अपने
हर फूल हर सितारा
रख ले तूं
अपने आचल के लिए.   

'लम्स' से
सुधीर मौर्या 'सुधीर'
गंज जलालाबाद, उन्नाव
209869
09699787634

Wednesday, 9 May 2012

दिनचर्या


दिन गुज़रा जब रो रो के
और आँखों से बरसात हुई 
दिल और भी तब बेचैन हुआ 
जब साँझ ढली और रात हुई

घडी की हर एक टिक टिक का 
सम्बन्ध बना मेरी करवट से
तेरी याद में कितना तडपा हूँ
पूछो चादर की सलवट से

छिपते ही आखिरी तारे के
मेरी आँख की नदिया फूट पड़ी 
सूरज की पहली किरन के संग
तेरी यादें मुझ पर टूट पड़ी 

दिन गुज़रा जब रो रो के
और आँखों से बरसात हुई

सुधीर मौर्या 'सुधीर'
गंज जलालाबाद, उन्नाव
२०९८६९
०९६९९७८७६३४

Tuesday, 8 May 2012

आँख की नदिया सूख गई हे

सुन्दर गोरी और
जवान
ऊपर से ऊँची
जात की वो.                                    
अपने घर के
नोकर से ही
बाज़ी हार गई
जज्बात की वो.

कुछ आँखों ने था
देख लिया
छुप-छुप कर
मिलते बागो में
वो तीन दिनों से
गायब हे
जो रहता था
उसकी आँखों में.

कल शाम नहर के बांध में
उसकी ही
लाश पाई गई
वो रो न सकी
कुछ कह न सकी
उसकी आँखों की नदिया
हो न हो
शायद सूख गई.


सुधीर मौर्या 'सुधीर'
गंज जलालाबाद, उन्नाव
पिन- २४१५०२
09699787634