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Thursday, 28 June 2012

टूटे ख्वाब...




आँख से टूट कर
गिरे हुए ख्वाब को 
वापस जो आँख में 
मैंने सजाने की 
कोशिश  की

यूँ लगा 
दहह्कता शोला
हाथ मैं पकड़ लिया 

क्या टूटे हुए ख्वाब
ऐसे ही जला करतें हैं
तभी तो सभी
ख्वाब टूटने का
गिला करतें हैं....



मेरे कविता संग्रह 'हो न हो' से.... 

Thursday, 21 June 2012

इंतज़ार...


में 
कभी जो जाता हूँ
उसके शहर
न चाह  कर भी
मेरे कदम
खुद बा खुद
मुड जाते हें
उसके कुचे के जानिब.

उसके घर के
सामने के
मंदिर की ओट में
खड़े हो कर
मैं अब भी देखता हूँ
उसके दरवाज़े को
जानने को ये 
क्या अब भी वो करती हे इंतज़ार
दरवाज़े पर मेरा 

मायूस होकर
मेरे कदम
खुद बा खुद
वापस मुड जाते हैं. 

'हो न हो'   से..

Wednesday, 13 June 2012

ओ अमृतमयी प्रिये..


ओ अमृतमयी प्रिये
मुझे याद तो करते होगे.

जब कोई नव योअना, किसी
नवयुवक के साथ   ठिठोली करती होगी,
जब कोई अल्हड 
किसी कुंवर के साथ चलती होगी
अपने शरीर का स्पर्श देते हुए
ओ अमृतमयी प्रिये
तब मुझे याद तो करते होगे.

जब गावं की कोई क्वांरी
अपने किसी मनमीत को 
पलाश के पत्ते के बने दोने में
अपने हाथ से जामुन खिलाती होगी,
कांसे के लोटे में
नहर का पानी लाकर, उसे
अपनी अंजुली से पिलाती होगी

ओ अमृतमयी प्रिये
तब मुझे याद तो करते होगे.

'हो न हो' से...

Sunday, 10 June 2012

प्रेम में फरेब..


पिछले कई दिनों से
सूरत लगती थी उसकी
कुम्हलाई हुई इ
अक्सर दिखती थी
वो घबराई हुई सी.

कम हो गया था 
उसका कालेज जाना
वो शरारतें उसकी
वो मुस्कराना.










तब्दीलियाँ आने लगी थी
शरीर में उसके
डूबे रहते थे आजकल
नेंन, नीर में उसके

खो दिया था उसने
अपना कुछ तो
समर्पित करना था उसे
सुहाग सेज पे जिसको.

खाया था उसने
हो न हो
प्रेम में फरेब 
किसी से इन दिनों.






'हो न हो' से..

Sunday, 3 June 2012

दस्ताने हुस्न


कुदरत ने जो तुलिका उठाई बुत बनाने को
बनाया न था उसने कभी इस तरह जनाने को
की उस बुत के लब चूमने को हर कोई बेताब
होड़ थी फरिस्तो में उसे गले लगाने की..

Friday, 1 June 2012

साँझ,जून २०१२





अतीत से में - शहरयार, अदम 'गोंडवी', फिराक गोरखपुरी, और परवीन शाकिर  
काव्य धरा में - संजय वर्मा 'दृष्टि', विनीता जोशी, सबा युनुस, सफलता सरोज और मधुर गंज्मुरादाबदी.
कथासागर में - डॉ. तारा सिंह की लघुकथा   
व्यंग-मृदंग में - स्वप्निल शर्मा  
लेख-आलेख में - निकिता बेदी