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Thursday, 21 June 2012

इंतज़ार...


में 
कभी जो जाता हूँ
उसके शहर
न चाह  कर भी
मेरे कदम
खुद बा खुद
मुड जाते हें
उसके कुचे के जानिब.

उसके घर के
सामने के
मंदिर की ओट में
खड़े हो कर
मैं अब भी देखता हूँ
उसके दरवाज़े को
जानने को ये 
क्या अब भी वो करती हे इंतज़ार
दरवाज़े पर मेरा 

मायूस होकर
मेरे कदम
खुद बा खुद
वापस मुड जाते हैं. 

'हो न हो'   से..

7 comments:

  1. बहुत सुन्दर रचना...
    :-)

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  2. सुधीर भाई आपकी रचना बहुत अच्छी लगी।आशा और निराशा का द्वंद रहा।

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (23-06-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!

    ReplyDelete