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Wednesday, 13 June 2012

ओ अमृतमयी प्रिये..


ओ अमृतमयी प्रिये
मुझे याद तो करते होगे.

जब कोई नव योअना, किसी
नवयुवक के साथ   ठिठोली करती होगी,
जब कोई अल्हड 
किसी कुंवर के साथ चलती होगी
अपने शरीर का स्पर्श देते हुए
ओ अमृतमयी प्रिये
तब मुझे याद तो करते होगे.

जब गावं की कोई क्वांरी
अपने किसी मनमीत को 
पलाश के पत्ते के बने दोने में
अपने हाथ से जामुन खिलाती होगी,
कांसे के लोटे में
नहर का पानी लाकर, उसे
अपनी अंजुली से पिलाती होगी

ओ अमृतमयी प्रिये
तब मुझे याद तो करते होगे.

'हो न हो' से...

3 comments:

  1. सुधीर जी,बहुत खूब

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  2. बहुत सुन्दर भाव,

    सादर
    अनु

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