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Tuesday, 25 December 2012

पर समाज की रीत..



Sudheer Maurya 'Sudheer'
*********************************

बरसो बाद 
पतझड़ो के मौसम में
उनका दीदार हुआ..
हाथ में चूडियाँ
पावं में महावर
आँखों में काजल
और
माथे पे सिंदूर..

मुझे देख कर
उनके होठों पे
तैर गई, वही मुस्कान
जो बचपन से 
उनकी सूरत की सहेली रही...
और सच  पुछो तो 
यही मेरे जीवन की 
सबसे बड़ी पहली रही..
हाँ, हम जान ही न पाए
मुझसे प्रीत 
निभाते-निभाते
वो कब गैर हो गये

मुझे खामोश देख
उन्होंने हंस के
मेरा हाल पूछा 
में धीरे से बोल
बस जी रहा हूँ
कुछ ख़ास नहीं
तभी मेरे दिमाग में
विचार कोंधा
उनके चेहरे पे भी
पहले सा उजास नहीं

तभी एक 
चार साल की बच्ची
उन्हें मम्मी कह के
ऊँगली पकड़ के ले चली
बगल से गुजरते 
उनके आँचल के लम्स
ने मुझे 
ये एहसास कराया
अब उनमे  भी 
वो महक ,
वो लहक,
वो चहक - नहीं

शायद उन्हें 
बेवफाई उनकी
चैन से रहने नहीं देती
पर समाज की रीत 
अब भी उनके होठो से
कुछ कहने नहीं देती...

सुधीर मौर्य 'सुधीर'
गंजा जलालाबाद, उन्नाव
209869

Sunday, 23 December 2012

ओ ! हिन्द की बेटी दामिनी ..


सुधीर मौर्य 'सुधीर'
********************

सलाम करता हूँ 
में तेरी हिम्मत को
! हिन्द की बेटी
'दामिनी'
तुझे लड़ना है
मौत से 
और देना है उसे 
शिकस्त
उठ 
और बिजली की तरह 
चमक कर
सार्थक कर दे 
अपना नाम 
और लिख दे 
उन दरिंदो के
खून से
आसमान के
केनवास पर 
तूँ अबला नहीं  
जो दम तोड़ दे
घबरा के जहाँ के
 सितम से
तूँ तो वो सबला है
जो मिटा देती है
जुर्म करने वालो 
का नामोनिशान... 

  
(ये कविता नहीं दुआ है )  

Sudheer Maurya 'Sudheer'
sudheermaurya1979@rediffmail.com

Monday, 12 November 2012

कुछ मेरी भी खता होगी...



हर फैसला मेरे बाबत उसी का था
वो शक्स जो मुझे अब पहचानता नहीं

उसकी यादो के सहारे ही जी लेते
जो वो ख्वाबो में आकर सताता नहीं

नहीं-नहीं ये खबर मेरे दुश्मनों की होगी
उसके बालो में अब गजरा महेकता नहीं

कुछ मेरी भी खता होगी जो वो यूँ खफा हुआ
मेरे शहर में आये और मेरी गली से गुजरता नहीं

मेरी महक का निशां तेरी  सांसो में तो होगा
क्या तेरी जबीं पर मेरा लम्स दमकता नहीं

'लम्स' से..
सुधीर मौर्य 'सुधीर'  

Friday, 12 October 2012

तेरे होंठ की सुर्खी...




तेरे होंठ की सुर्खी ले-ले कर
हर फूल ने आज किया सिंगार
तेरे ज़ुल्फ़ की खुशबु मौसम में
तेरे दम सेकालियों पे है निखार

जिस महफ़िल में तुम आ जाव
वहां एक सुरूर आ जाता है
मेरे शानो पे जब सर रखती हो
मुझे खुद पे गुरुर आ जाता है

कविता संग्रह 'हो न हो' से..

Wednesday, 26 September 2012

ओ मेरी सुरमई प्रिये !



ओ मेरी सुरमई प्रियतमे
तुम्हे याद है,
जब मुझे अपनी आँखों से
तुम महुवे का रस पिलाती थी
और में मदहोश होकर
तुम्हारी गोद में सर रखकर
लेट जाता था-तब तुम
अपनी नर्म कोमल अँगुलियों से
मेरे बालो में 
कंघी करती रहती थी...

ओ हिरनी सी आँख वाली 
मेरी प्रेयसी
तुम्हे याद है
जब मेरे गालों पर, तुम अपने
केसर से महकते बाल बिखेर देती थी
और में उन बालों के स्पर्श से-
रोमांचित हो
तुम्हे और नजदीक खिंच लेता था
तब तुम मेरी पौरषीय गंध से
अपनी आँखे बंद कर  
मेरे सीने में दुबक जाती थी...

ओ मेरी 
सुरमई प्रिये !


नज़्म संग्रह 'हो न हो' से...

सुधीर  मौर्य  'सुधीर' 
 

Wednesday, 19 September 2012

सात बसंतो का प्रेम...



ओ मेरे गावं की
नोखेज़ दोशीजा !
मेरी प्रियतमा...
मैंने महसूस किया है
तेरी पिंडलियों की 
थरथराहट को
उस वक़्त
जब म्रेरे होठों के लम्स से
तेरे होठ
भीगती रात में सरशार हुए...

अरी ओ रसगंधा !
मेरे जन्मो की प्रेयसी 
इसी जन्म में चुकणी थी क्या
तेरे बदन की मह्वाई  गंध
या आठवां जन्म था हमारा
जो तूं सात बसंतो की 
मेरी प्रीत को
भूल गई और
फाल्गुनी बयार में
एक गैर की शरीके हयात हुई...
यकीन मान, उसी दिन से
तेरी ज़ीस्त में दिन और मेरी रात हुई...

नज़्म संग्रह 'हो न हो' से...
सुधीर मौर्य 'सुधीर'

Friday, 14 September 2012

गैरों की बज़्म में यूं बेरिदा ही झमके...



तेरे इश्क में सितमगर कैसे अज़ाब देखे
काँटों पे ज़बीं रखे रोते गुलाब देखे

गैरों की बज़्म में यूं बेरिदा ही झमके
हमने तो रुख पे तेरे हरदम नकाब देखे

बनके रकीबे जां तुम उल्फत में मुस्कराए
मिटा के मुझको तुने कैसे शवाब देखे

इश्क की बला से कोई बच न सका 'सुधीर'
इसके कहर से खाक में मिलते नवाब देखे....

ग़ज़ल संग्रह 'आह' से...

सुधीर मौर्य 'सुधीर'